23 अप्रैल 2010

अजब देश के गजब हैं नेता

बचपन में किसी बुर्जुग ने यूं ही हंसी-ठिठोली में मुझे एक विशेष किस्म का पहाड़ा पढ़ाया था। प्राइमरी स्कूल में 2 से लेकर 20 तक का पहाड़ा तो मास्टर जी ने चिल्ला-चिल्ला कर इतना रटा दिया था कि वह ऑटोमैटिक मशीन की तरह जुबान पर चढ़ गया था। कोई बोला नहीं कि माइक्रो सेकेंड की स्पीड से पहाड़ा चालू! लेकिन उस बुर्जुग द्वारा बताये गये पहाड़े में कुछ खास बात थी, वहां अंकों का नहीं शब्दों का पहाड़ा था। जिसमें अपने देश, समाज, और व्यवस्था का गुणा-भाग, जोड़-घटाव सब कुछ था। आज भी कभी-कभी वह पहाड़ा याद आ जाता है। बुर्जुग ने कहा भी था कि-बेटा यह ऐसा पहाड़ा है, जो तुम्हे हर वक्त काम आयेगा। मैंने उस समय तो बचपने वश उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया, पर पहाड़ा था बड़ा लाजवाब आप भी पहले सुन लिजिए फिर बतियायेंगे...
नेता एकम नेता
नेता दूनी दगाबाज़
नेता तिया तिकड़मबाज
नेता चौका चतुर-चालाक
नेता पंजे-पक्का हरामी
नेता छक्का-छी छी छी छी छी
नेता साते- सच में झूठा
नेता अट्ठम- अठन्नी चोर
नेता नवां- नमक हराम
नेता दहा में- 10 सुन्ना बगल में ....
अब 10 सुन्ना बगल में, का रहस्य तो आप समझ ही रहे होंगे और बाकी के शब्दों की परिभाषा हम आप से बेहतर भला कौन जान सकता है? हां नेताओं को थोड़ी व्याख्या करनी पड़ सकती है, क्योंकि बेचारे आज तक इन शब्दों का भावार्र्थ नहीं समझ पाये हैं। देखिए अपने मेगा क्रिकेट कानिर्वाल यानि आईपीएल को ही देख लिजिए। नेता जी की कथा-व्यथा सब कुछ दिख रही है। फिर भी सफेद खादी लपेटे उससे भी सफेद झूठ बोल रहे हैं कि हमें तो कुछ पता ही नहीं? एक चले गये और खेल अभी बाकी है मेरे दोस्त की तर्ज पर फिल्मी पटकथा राजनीति के पर्दे पर पूरा देश फ्री ऑफ कॉस्ट देख रहा है। सच का झूठ और झूठ का सच...दो चार दिन में इतना हॉच-पॉच हो जायेगा कि आम पब्लिक कन्फ्यूज! खैर, नेता जी की पुत्री हैं तो आईपीएल की हॉस्पिटैलिटी मैनेजर हैं, वह भी मात्र 24 साल की कम उम्र में। टैलेंट है, आपके पास नहीं तो कोसिये, कौन मना कर रहा है।
ठीक है भई कोरी बात नहीं...मंत्री जी के परिवार का फोन आ जाए तो सरकारी कर्मचारी तो पागल हो जाते हैं, क्या करें? कैसे करें? कि मंत्री जी नाराज ना हों, कीमत, हमारी आपकी ऐसी-तैसी। सुनंदा जी, ऐसी सफल बिजनेस वुमेन है कि एक कंपनी का 25 प्रतिशत शेयर ही तनख्वाह में लेती हैं? गुड है जी! देश के किसी एक गरीब परिवार की बेटी थोड़ी-बहुत पढ़लिखकर एक कुछ हजार की नौकरी कर ले तो बाप-मां इतने खुश होते हैं कि जीवन भर की गरीबी, लाचारी को भूलकर मिठाई जरुर बांटेंगे। इसी देश के नेताजी की बेटी इतने बड़े ऑर्गनाइजेशन की हॉस्पिटैलिटी मैनेजर है और नेता जी दु:खी भाव से कहते हैं कि मेरी बेटी मामूली सी जूनियर कर्मचारी है। यह इसी देश की दो तस्वीरें हैं। देखिए, सोचिए और परखिये!! सॉरी सॉरी कुछ ज्यादा ही समझा रहा हूं, बेवकूफ मैं।
देश में महंगाई है, भूख है, गरीबी है और इससे आजि़ज आकर बंदूक थामे अपनों को ही निशाना बना रहे नक्सली हैं। लेकिन इस सरकार को आईपीएल पर बात करने के लिए फुर्सत है, इन चीजों पर कोई ध्यान नहीं। अभी किसी एक नेता का ही बयान आया था कि पता नहीं कैसे नेताओं को क्रिकेट के बारे में सोचने तक की फुर्सत मिल जाती है। सुनने में कितना आदर्शवादी बयान है, पर उन्हीं की सरकार में व देश के कृषि जैसे महत्वपूर्ण विभाग के मंत्री, बस क्रिकेट ही सोचते, बोलते और समझते हैं। बाकी के लिए वे कोई ज्योतिषी थोड़े ही हैं कि बता देंगे-महंगाई कम होने वाली है। यह चरित्र है, उस देश के नेताओं का जिनका काम तो समाजसेवा का है, पर असल में वे स्वसेवा, स्वजन सेवा के आगे का पहाड़ा नहीं जानते। पर जनता जान रही है यह पहाड़ा और वह पहाड़ा भी जो ये जनता को पढ़ाते हैं।

14 अप्रैल 2010

खामोश! मैं महगाई हूँ भाई...

चरण कमल बंदौ हरिराई, आंख खुली तो पाई मंहगाई।
जैसे ही यह गीत पुरुषोत्तम महाराज ने स्टेज से गाया, पूरे हॉल में तालियों की गडग़ड़ाहट फैल गयी। ऐसा लगा मानों मंहगाई का पुर्नजन्म हो गया। सभी श्रोतागण मंहगाई के पुर्नस्थापित होने पर गौरवान्वित हो रहे थे। क्योंकि वहां उपस्थित सभी 'जन' या तो लेखक थे या कवि। इनके लिए यही तो एक सदाबहार मुद्दा है, जिस पर कलम घिसने भर से घर का चूल्हा-चौका विधिवत कार्य करने लगता है। वर्ना कौन पूछने वाला है इन मंहगाई के प्रचारकों को। इस बार के कवि सम्मेलन में कविवर सिसकीनाथ भी आमंत्रित किए गये थे। ये वहीं कविवर सिसकीनाथ हैं, जिन्होंने देश-विदेश के कवि सम्मेलनों में कविता के साथ सिसकियों का बेज़ोड़ प्रस्तुतिकरण किया है। इसके लिए भारत सरकार ने इन्हें 'सिसकीश्री' की उपाधि से विभूषित भी किया है। सिसकीनाथ जैसे ही मंचासीन हुए पूरा माहौल रुग्ण हो गया। लोग ऐसे सिसकने लगे जैसे मंहगाई की मारी गृहणियां आंटा गूंथते वक्त सिसक पड़ती हैं। आप तो जानती ही हैं कि गृहणियां प्याज काटते वक्त ही सिसकती थीं, मगर जब से यह मुंआ प्याज पचास के पार चला गया तब से गृहणियों को सिसकने से फुर्सत मिल गयी है। क्योंकि न घर में प्याज़ आयेगा, न इन्हें काटना पड़ेगा और न हीं प्याज आंखों में लगेगी।
खैर सिसकीनाथ जी ने माहौल को हल्का बनाने हेतु माइक झपट लिया और अपनी ऐतिहासिक कवि गोष्ठिïयों की बातें बताने लगे। उनकी व्यंगात्मक चुटकियों को सुनकर मंहगाई के मारे कवि व लेखक कुछ मुस्कुराये जरुर पर हंसी किसी की नहीं फूटी। हंसी फूटेगी भी कैसे? क्योंकि यहां मंहगाई पर कवि सम्मेलन जो चल रहा था। अब आप खुद समझ सकती हैं कि मंहगाई और हंसी का संबन्ध सांप-नेवले जैसा ही है। यदि देश में मंहगाई है तो हंसी गायब! और गाहे-बगाहे हंसी आ गयी तो वहां मंहगाई की चर्चा नहीं होती। तो यहां भी कुछ ऐसा ही माहौल था। इकट्ठे लोग मंहगाई को कोसने के लिए हुए थे, मगर खुद इसके शिकार बन गये। इस कवि सम्मेलन के संचालनकर्ता मिश्रीलाल ने गलती से मुझे भी आमंत्रण पत्र भेज दिया था। वैसे मिश्रीलाल के बारे में भी सुनते चलिए। मिश्रीलाल निहायत ही फेंकू टाइप के व्यक्ति हैं, इतना फेंकते हैं इतना फेंकते हैं कि बस आप लपेटते चले जाइए और बिना वीज़ा व पासपोर्ट के ही अमेरिका तक की दूरी नाप डालिए। मिश्रीलाल के इसी फेंकू गुण से प्रभावित होकर शहर के सभी लोग इन्हें हर खास आयोजन में संचालन की जिम्मेदारी दे देते हैं। इससे दोनों का भला हो जाता है। यदि सम्मेलन या आयोजन में अपेक्षा से कम लोग इकट्ठे हों और माइक संभालने वाले वक्ता भी व्यस्त हों तो फेंकू बड़ा काम कर जाते हैं। मिश्रीलाल एक बार माइक संभालते हैं और किसी विषय पर इतना फेंक देते हैं कि किसी अन्य वक्ता की जरुरत ही नहीं पड़ती और सभा का समापन मिश्रीलाल के संचालन से ही हो जाता है।
जैसे ही इस कवि सम्मेलन का हाथ से लिखा निमंत्रण पत्र घर पर पहुंचा, मेरी श्रीमती जी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। क्योंकि, उन्हें लगा कि आज शाम को मेरा भोजन इस सम्मेलन में ही हो जाएगा और उन्हें रोज़ की तरह 25 रोटियां नहीं बनानी पड़ेंगी। सबके घर में खटपट होती है मियां-बीबी के बीच मन-मुटाव होता है, मेरे साथ भी ठीक वैसा ही है, पर कारण, वहीं रोज़ की 25 रोटियां। क्योंकि मेरी बीबी को लगता है कि यदि मैं 25 रोटियां नहीं खाता तो सबसे आदर्श पति बनने के सारे गुण मुझमें थे। पर इन 25 रोटियों 500 ग्राम चावल ठूसने की मेरी आदत ने मेरा वैवाहिक जीवन लगभग बिगाड़ दिया। पर आज श्रीमती खुश थीं कि चलो कम से कम 1 दिन तो आराम मिलेगा। अब आप समझ चुकी होंगी कि मेरी श्रीमती मेरे साथ किस तरह गुज़ारा कर रही हैं वह भी इस भीषण मंहगाई के दौर में। सोचिए, सोचिए सोचने पर कोई टैक्स थोड़े ही लगता है!
शाम को जैसे ही दरवाज़े पर पहुंचा तो सामने से पत्नीश्री की मुस्कुराहट देखकर मन में विस्मय हो चला कि आज क्या होने वाला है। उन्होंने एक सांस में पूरी बात बतायी और निमंत्रण पत्र थमाते हुए बोलीं कि समय मत बर्बाद करो, सम्मेलन में जाने का टाइम हो गया है। मैंने कहा-अरे थोड़ा सांस तो लेने दो, अभी-अभी तो आया हूं और अभी चला जाऊं। पत्नी ने मन ही मन सोचा कि सांस लेने में ही 100 ग्राम चीनी फांक जाते हो। पता भी है चीनी कितनी मंहगी हो गयी है। खैर मैं भी ठहरा ठेठ कवि, मन में कविताओं की कोंपलें फूटने लगीं। मंहगाई और लुगाई से त्रस्त जीवन में ऐसे विचार आने लगे जैसे कभी अरस्तू, शुकरात को आये होंगे। खूब सज-धजकर मैं कवि सम्मेलन में पहुंचा था। वहीं सिसकीनाथ जी के बगल में बैठा, उनके वक्तव्य के खत्म होने का इंतज़ार कर रहा था। तभी पूरे हॉल में सिसकियों का सैलाब आया और लगा मानो सब कुछ थम गया है। सिसकीनाथ जी अपनी बात रख चुके थे और अन्य कवियों को आमंत्रित करने के लिए मिश्रीलाल माइक थाम चुके थे। मिश्रीलाल बोले- दोस्तों जब मैं पैदा हुआ तो हमारे पिताजी को मिठाई बांटनी पड़ी। उस ज़माने में काफी सर्च करने के बाद मिश्री ही सबसे सस्ती मिठार्ई मिली थी। जिसे बांटकर मेरे पिताजी ने मेरे आने को सेलिब्रेट किया था। पर यदि आज़ वे जिन्दा होते उन्हें बड़ा दु:ख होता। क्योंकि चीनी की मंहगी कीमत और मिश्री में हो रही मिलावट से परेशान हो जाते। उस समय सस्ती मिश्री मिली थी, इसलिए खुश होकर उन्होंने मेरा नाम मिश्रीलाल रख दिया था। ले-देकर मिश्रीलाल मंहगाई के प्रभाव व अपने नाम की सार्थकता समझाकर मुझे पुकारने लगे...
बोले अब आपके सामने आ रहे हैं एक ऐसे सख्श जो रोज़ मंहगाई की त्रासदी से दो चार होते हैं और संयोग से उनका नाम भी है मंहगूराम! हालांकि कवि मंहगूराम हैं बड़े सस्ते! और यहां इस मंच पर 'फ्री' में आये हैं। भोज़न के लिए भी तैयार नहीं होंगे, क्योंकि आपकी सुविधा के लिए मैं बताना चाहूंगा कि कार्यक्रम के अंत में होने वाला प्रीतिभोज का कार्यक्रम नितांत नीजी कारणों से रद्ïद कर दिया गया है। तो स्वागत है कवि मंहगूराम का...इधर भोजन न मिलने की बात सुनते ही मेरी हालत खराब हो गयी थी। सांसे तो थीं, पर चलने में कष्टï हो रहा था। दिल की धड़कनें डूबने लगीं, पैरों में लगा जान ही नहीं है और आवाज़ तो कंठ से बाहर आने का नाम ही नहीं ले रही थी। रोज़ 25 रोटियां तोडऩे वाला सख्श भूखे पेट, मंहगाई पर भला क्या बोलेगा? सभा में आये सभी लोगों को निराशाभरी नज़रों से देखते हुए व लडख़ड़ाते कदमों से मैं माइक तक तो पहुंच गया। पर कंठ से स्वर नहीं फूट रहे थे। हॉल में बैठे लोग हल्ला मचाने लगे, लोगों को लगा था मैं मंहगाई पर कुछ अच्छा खासा भाषण दूंगा, मगर मैं तो भोज़न में बारे में सोच-सोचकर व्यथित हो चुका था। पेट के चूहे आज़ समय से पहले ही दौडऩे लगे थे, शायद उनको भी दावत उड़ाने का मानसिक संदेश मिल चुका था। लेकिन यहां तो सब उल्टा हो गया, सभा थी, कवि थे, मंहगाई थी पर कोई नहीं था तो वह था भोज़न! सब मुझसे कुछ सुनना चाह रहे थे, पर मैं बोल नहीं पा रहा था। हॉल में हल्ला इतना बढ़ गया कि मैं घबरा गया। पर थोड़ी बहुत हिम्मत जुटाकर मैं सिर्फ यहीं बोल पाया-खामोश!मैं मंहगाई हूं भाई...(मंहगाई बोलती नहीं महसूस होती है)

12 फ़रवरी 2010

वालेंटाइन लाइन शाइन बट फाइन....

वैसे तो प्रेम करने का कोई विशेष दिवस निर्धारित नहीं किया जा सकता। क्योंकि प्रेम कब किस तरह और किस रुप में प्रकट हो जाए इसका कोई निश्चित मापदण्ड नहीं है। फिर भी बाजार की ताकतों ने प्रेम को प्रदर्शित करने हेतु दिवस निश्चित कर ही दिया। जब दिवस बन ही गया है तो मन भी जाएगा। जैसे पीने वाले को पीने का बहाना चाहिए और जीने वालों को जीने का, ठीक वैसे ही दिवस मनाने वालों को तो बस 'डेट' को इंतजार रहता है।
स्वतंत्र देश के अनंत कुंवारों के लिए एक अच्छी सूचना प्रसारित करी गयी। सूचना थी कि आगामी 14 फरवरी को देशभर में विश्वव्यापी प्रेमी/प्रेमिका 'खोजन' प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। अत: सूचना प्राप्त होते ही सभी पूर्णकालिक व अंशकालिक कुंवारे सावधान हो जाएं तथा उक्त तिथि को वेल सूटेड-बूटेड प्रतियोगिता स्थल रवाना होवें।
इस 'प्रेम-दिवस' की पावन प्रतियोगिता के लिए प्रेमिकाओं से विशेष आग्रह है कि वे अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा 'खुलकर' पेश आवें और पूर्णत: नवश्रृंगार से विभूषित होकर प्रेमियों के सम्मुख उपस्थित हों। यदि संभव हो सके तो प्रतियोगित से प्राप्त फूलों को सुरक्षित रखने हेतु ब्रांडेड बैग साथ में अवश्य लायें। क्यूंकि इस प्रतियोगिता के कुछ दृश्य-अदृश्य नियम भी हैं, जो आपको बाकायदा बताये जाएंगे। इन नियमों का प्रभाव प्रतियोगिता पर पडऩा निश्चित है। इस प्रतियोगिता का मुख्य आकर्षण यह है कि इसका रिजल्ट हाथों-हाथ प्राप्त किया जा सकेगा। यदि बात जम गयी तो गले में बाहों का हार स्पष्ट दिखाई दे सकता है, अन्यथा अंगुलियों के पांचों निशान श्रीमान् जी की मुख-मुद्रा को थोड़ी देर के लिए विचलित कर सकते हैं। इसलिए प्रतियोगिता में भाग लेने वाले सभी 'प्रेमियों' को विशेष रुप से सूचित किया जाता है कि वे पूरे कांफिडेंश के साथ किसी एक ही 'प्रेमिका' को प्रपोज करने की हिमाकत करें। साथ ही इस बात का विशेष तौर पर ध्यान रखें कि कहीं सामने वाली प्रेमिका आपकी ही 'एक्सपायरी डेट' ना हो। क्यूंकि कभी-कभी श्रृंगाररस से आह्ललादित होकर और सामने वाली के रुप-लावण्य में विभोर होने के पश्चात् भूत, भविष्य व वर्तमान का ज्ञान नहीं रह जाता। इसलिए इस बात से पूरी तरह आश्वस्त होकर ही प्रतियोगिता की 'प्रेमिकाओं' को चुनें।
इस प्रतियोगिता में 'प्रेमिकाओं' के लिए विशेष प्रायोजन किये जायेंगे। जैसे, प्रेमिकाएं चाहें तो वे अपने वैलेंटाइन को मिनट दर मिनट के हिसाब से बदल सकती हैं। उनके लिए वैलेंटाइन यानि प्रेमी बदलने की अनलिमिटेड छूट इस प्रतियोगिता का आकर्षण है। साथ ही 'प्रेमियों के साथ अन्याय न करते हुए, उनके लिए भी कुछ आकर्षक स्कीमें रखी गयी हैं। जैसे कि उनके पास तीन ऑप्शन मौजूद होंगे। पहला यह कि वे लाल फूल देकर अपने लिए 'प्रेमिका' रुपी खतरा चुन सकते हैं। यदि वे इस खतरे को एडाप्ट नहीं करना चाहते या इससे बचना चाहते हैं तो पीला फूल देकर प्रेम की गुहार भर लगा सकते हैं। इससे बड़ा फायदा यह होता है कि खतरे को भली-भांति पहचानने के लिए पूरा टाइम मिल जाता है। फिर आगे आपकी मर्जी! पर प्रेमी यदि सिर्फ हाय-हैल्लो और मूवी-डिनर तक ही सीमित रहना चाहते हैं तो वे सफेद फूल देकर अपनी अर्जी 'प्रेमिका' तक पहुंचा सकते हैं। यह नियम सिर्फ और सिर्फ 'प्रेमियों' की जमात पर ही लागू होगें। 'प्रेमिकाओं' को इस टर्म एंड कंडीशन से पूरी तरह मुक्त रखा गया है।
सबसे मुख्य सूचना को कृपया ध्यान से समझें। प्रतियोगिता अपने नियत तिथि पर व्यापक स्तर पर मनायी जाएगी। इसकी जानकारी के लिए आप अभी से नियमित अखबार, पत्रिकाएं, टीवी, रेडियो व इंटरनेट का उपयोग करें, इससे आप स्वत: इस आयोजन में भाग लेने के लिए प्रेरित होंगे। मन की दबी-कुचली, भोथरा चुकी आकांक्षाएं पल्लवित होने लगेंगी और जब आपके अंदर ज़मीर जागेगा तब तक आप इस प्रतियोगिता का हिस्सा बनने का आवेदन कर चुके होंगे। इस संचार माध्यमों से निकटता बनाये रखें, इससे आपके अन्य के नजदीक जाने का मार्ग प्रशस्त होगा। शादीशुदा पुरुषों में भी 'पे्रमत्व' का गुण पैदा होगा और ऐसी स्त्रियों में 'प्रेम-पिपासा' का स्पंदन स्पष्ट संचार करेगा।
टीवी की बहुएं, सासें और खलनायिकाएं सब इस प्रतियोगिता में आपको डूबोने के लिए तरह-तरह के प्रयोजन करेंगी। माताओं से आग्रह है कि वे इन दिनों वैलेंटाइन के 'वायरस' से बचने के लिए संचार माध्यमों से दूर रहें व अपने-आपको पूजा-पाठ में व्यस्त रखें, अन्यथा यह 'वायरस' उन्हें भी प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए प्रेरित कर सकता है। इस प्रेमी/पेरमिका 'खोजन' प्रतियोगिता में हिस्सा लेने संबंधी समस्त खरीदारी अभी से सर्वत्र उपलब्ध है। कृपया अपनी जेबनुसार सामग्री का चयन कर उसे समय से पहले खरीद लें। आगे चलकर यहां भी ब्लैक मार्केटिंग का खतरा है और सामान अपने वास्तविक मूल्य को त्याग, दुगूने-तिगुने दाम पर मिल सकते हैं। प्रेमी/प्रेमिका 'खोजन' प्रतियोगिता दरअसल 'प्रेम-दिवस' अर्थात् 'वैलेंटाइन-डे' के उपलक्ष्य में मनाया जाएगा। इसलिए इस प्रतियोगिता के नियमों से भलीं-भांति परिचित होना चाहिए। हमने प्रेमी/प्रेमिकाओं को अलग-अलग तरीके से समझा दिया है कि इस प्रतियोगिता में क्या करें और क्या न करें।
हां दुकान से ख्याल आया आजकल मोबाइल व इंटरनेट मैसेज के अत्याधुनिक युग में भी कार्ड्स इतने प्रासंगिक हैं, यह भी बाज़ार और दुकान की ही माया है। मोहक मुस्कान वाले कम उम्र बच्चे भी इस प्रतियोगिता का हिस्सा बन सकते हैं, मगर उनकी अलग से श्रेणी बनायी जाएगी। बच्चों को सिर्फ बच्चों से ही प्रेम-प्रदर्शन की छूट दी जाएगी। वे अपनी हाइट, साइज़ व एज के हिसाब से अपने लिए प्रतियोगी चुन सकते हैं। यदि हालात साथ नहीं दे रहे तो ईमेल या मोबाइल मैसेज के जरिये अपने प्रेम का संदेश संबधित बालक या बालिका तक पहुंचा सकते हैं। अंत में इस प्रतियोगिता के सबसे मुख्य बिन्दु से आपको अवगत कराया जा रहा है। प्रेमालाप करते समय इस बात का ध्यान रखें कि आपके अगल-बगल कौन है? कहीं ऐसा तो नहीं कि अति-उत्साह से लबरेज होकर आप अपनी नीजी बातें सार्वजनिक करे जा रहे हैं। चूंकि 'प्रेम-दिवस' पर चारों ओर से घनघोर प्रेम-वर्षा होगी इसलिए अपने कोटे का ही प्रेम लेवें। कहीं ऐसा न हो कि प्रेम का 'ओवरडोज' हो जाए और आप अगले साल तक इस 'हैंगओवर' को महसूस करें।
इस प्रतियोगिता का स्वरुप विश्वव्यापी है, इसलिए इसका त्वरित व तात्कालिक असर देखा जा सकता है। इसलिए इस बात का विशेष ध्यान रखें कि प्रेमरस में डूबने के बाद भी अपने ठिकाने तक सही-सलामत पहुंचने की स्थिति बनाए रखें। अन्यथा यह सूचना पल भर में जहां-जहां नहीं पहुंचनी चाहिए वहां भी पहुंच जाएगी। हां एक बात और 'वैलेंटाइन-डे' अर्थात् 'प्रेम-दिवस' के पावन पर्व पर आयोजित होने वाली यह प्रेम पकड़ यानि प्रेमी/प्रेमिका 'खोजन' प्रतियोगिता के प्रयोजनकर्ता हैं प्रेम-गुरु। जिसे ठेठ यंगिस्तानी भाषा में आप लव गुरु के नाम से जानते हैं। तो मेरे साथ प्रेम से बोलिए लव गुरु महाराज की जय...

11 जनवरी 2010

शुगर फ्री शक्कारोलिज्म !

आमतौर पर पूरे देश भर में 'पिंचिंग कोल्ड' का प्रकोप जारी है। उत्तर भारत की हाड़ कंपाती ठंड से दक्षिण भारत की ठुड्डयां कंपकंपा जा रही हैं और जुबान फिसलन का कीर्तिमान अपने आप बनता जा रहा है। उधर शुगर (वहीं अपना चीनी) भाई! जो जुबान पर चढ़ाने भर से मंहगाई महसूस करा जाती है, के अद्र्धशतकीय हो जाने पर भी इसकी कड़वाहट को बांग्लादेश में खेली जा रही किक्रेट सीरिज़ से मीठा करने की कोशिश जारी है। दाल पहले से ही शतक लगाकर 'संभ्रान्त' लोगों की जमात का हिस्सा बन चुका है। चीनी की ठोस मगर आक्रामक पारी जारी है। आशा है कि वह भी जल्द ही उच्च कुलीन वर्ग का चहेता बन जाएगा। राजनीति में लस्टम-फस्टम चल रहा है। मंहगाई से जनता की जुबान खुद ही बंद हो चुकी है तो नेताओं ने 'चुप्पी' साध ली है।
आलम वही है कि जनता और नेता के बीच तीसरे आदमी ने अपनी डीलिंग से व्यवस्था को भ्रष्टतम्ï बनाने में कामयाबी पायी है। जहीर खान एकाध मैचों को छोड़कर सही लेंथ व लाइन मेंटेन करने में सफल रहे हैं, पर धोनी की 'लीडरशिप' ने भी कमाल किया है। हमारी लीडरशिप दुबई से चल रही है और पूरी मीडिया ने 'कथ्य' को 'तथ्य' के बराबर मान लिया है। एक तरह से यह 'तेज' गति की मीडिया का रास्ते से भटकना माना जा सकता है। जनता से जुड़ी सिर्फ क्राइम, पैशन और हंसोड़ खबरों के बीच राजनीति का चस्का 'मसालेदार' चाय तो बन सकती है। पर, मूल उद्देश्यों से इतर भूख मिटाने में अक्षम ही रहेगी।
पवार साहब बयान दे रहे हैं, चीनी 50 रुपये से कब कम होगी, पता नहीं? पर उन्हें यह पता है कि अगला आईसीसी अध्यक्ष बनने के लिए कहां-कहां जुगाड़ फिट करना है। ठीक भी है जनता को 'सेक्यूलरिज्म' के भंवरजाल में डालकर 'कुर्सीलिज्म' की राजनीति में सब जायज है। वैसे भी 'बंबई' में आजकल 'गॉलीवुड' की गरिमा बरकरार है। दिल्ली का 'दिल' इतना जोर कभी न धड़का होगा जैसा कि आजकल धड़क रहा है। शीतलहर का कहर दिल की धड़कन को बढ़ाने का ही काम तो कर रहा है, क्योंकि कॉमनवेल्थ की हेल्थ को बचाये रखना आजकल दिल्ली की शान से जुड़ चुका है। उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी बसें, सड़कों पर धूं-धूं जल जाती है, तो लोअर बसों से अचानक निकलने वाला धुंआ सीन से गायब हो जाता है।
कोई बात नहीं, जनता कल्याण सिंह के अयोध्या पहुंचने पर चुंधिया जाती है तो अमर सिंह के दुबई से इस्तीफे की चर्चा गांव-जवार की बतकही का हिस्सा बन जाती है। थरुर अपने शउर के मुताबिक कमेंटिया देते हैं तो राजनीति में कबड्डी सा माहौल बन जाता है। मौतें हो रही हैं, ठंडी में ठंड से, गर्मी में लू से, मंहगाई में भूख से और ऑल टाइम हिट मौत मतलब 'किसान' की मौत का बहीखाता फुल होने के बाद बंद कर दिया, अब इसकी गिनती रुहानी शक्तियां करती हैं। इंसानों के वश की बात नहीं रह गयी। फिर भी जनती जी रही है, जीती थी और जीती रहेगी। मगर, जीतेगा वहीं जनता के जीने की राह में रोड़े डालता है। आखिर यहीं तो 'जनतंत्र' है।

30 दिसंबर 2009

नववर्ष मंगलमय हो, जिंदगी रसमय हो !

सबसे पहले आपको नये वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं, साथ में बड़े-बड़े फूलों की मालाएं और इससे भी नया साल न समझ में आये तो डिस्को में जाकर, डीजे की धुन में जोर-जोर चिल्लाएं। फिर शायद आपको नया साल मनाने का असीम आनंद आ ही जाये। यदि इससे भी बात न बने तो यंग जेनेरेशन की भांति मदिरा के हल्के-हल्के दो पैग जरुर लगायें। इससे क्या होगा कि नया साल मने चाहे न माने लेकिन आपको मज़ा अवश्य आ जाएगा। आखिर जश्न मनाने का अंतिम पड़ाव तो मजा लूटना ही रहता है, सो आप सीधे सीढ़ी से उतरने की बजाए, डायरेक्ट लिफ्ट का सहारा लें। इससे न केवल नववर्ष मनाने का मज़ा आयेगा, बल्कि आपके आनंद की अनुभूति भी असीम हो जाएगी। तो आईये हम सब मिलकर हैप्पी न्यूईयर ट्ïवेंटी-टेन को सेलिब्रेट करें। अरे! ट्ïवेंटी-टेन नहीं समझे? मेरे साथ कोशिश करें समझ में आ जाएगा... अभी ट्ïवेंटी-ट्ïवेंटी का बुखार उतरा भी नहीं था कि ट्ïवेंटी-टेन का फीवर युवाओं के सिर चढ़ गया। सिर चढ़ ही नहीं गया, बल्कि अंधाधुंध डांस करने लगा। अब आप पूछेंगे कि भला ये ट्ïवेंटी-टेन क्या बला है? महाराज यह कोई बला-वला या तबला नहीं है, यह तो खालिस नाम है इस नये साल का। बिल्कुल आधुनिक, लेेटेस्ट और इंटरनेशनल स्टैंडर्ड वाला नाम! अब भारतीय कहने में शरम से मुंह लाल हो जाता है, तो इंडियन कह लेते हैं। नयी पीढ़ी कहने में लाज आती है, तो यंग जेनेरेशन का तगमा लगाकर सीना गर्व से फुला लेते हैं। आने वाली पीढ़ी कहने में जीभ लडख़ड़ा जाती है तो जेनेरेशन नेक्स्ट कहकर जीह्वïवा को आराम व पिछड़ेपन के बोध को विराम दे देते हैं। कुछ इसी तरह का है यह नया तजऱ्ुमा जिसे आजकल ट्ïवेंटी-टेन नामक मॉर्डन नाम से विभूषित किया जा रहा है। आप इसे सन्ï 2010 कह सकते हैं, लेकिन ध्यान रहे कि इसमें निहायत पिछड़ापन व विशुद्ध भारतीयता की बू आती है। यंगिस्तान इसे कबूल नहीं करेगा, हां बड़े-बूढ़ों के सामने आप बिना हिचक सन्ï 2010 कह सकते हैं। गलती से भी यंग जेनेरेशन के सामने न कहें, अन्यथा लेने के देने पड़ सकते हैं। तमाम तरह की मॉडर्न गालियों से आपको विभूषित किया जा सकता है तथा प्राचीन जाहिलियत से आपका श्रृंगार कर दिया जायेगा। इसलिए अच्छा यही होगा कि दबाव में ही सही लेकिन नये साल का स्वागत ट्ïवेंटी-टेन कहकर ही करें। ये नये ज़माने की नयी जेनेरेशन का नया शब्द है, जिसे इलेक्ट्रॉनिक गति से लोगों की जुबान तक पहुंचाया गया है और यहीं शब्द अब लोगों की जुबां पर चढ़ गया है। खैर यह अपना-अपना अंदाज है, नया रिवाज़ है, नयी आवाज़ है और इन सबसे बढ़कर यंगिस्तान का यंग मिज़ाज है। मनाने दीजिए उन्हें अपने हिसाब है। हम अपना गुणा-गणित क्यों फेल करें? भई वे भी तो पलटकर पूछ सकते हैं कि क्या जरुरत भी हमें अंग्रेजों का बेलबॉटम पैंट और कॉलरदार बुशर्ट अपनाने की। रहे होते, वही धोती-कुर्ता पहने और गमछा लपेटे! कौन सा पहाड़ टूट पड़ता जब अंग्रेजी फिल्मों की नकल करके सिनेमा नहीं बनाया होता, विदेशी गानों की जबरदस्त नकल कर आइटम सांग न बने होते। कम से कम प्योर भारतीय सिनेमा तो बचा होता। शास्त्रीय संगीत की स्वरलहरियां तो बची होतीं, लेकिन नहीं जी! आप करें तो शुभानअल्लाह और हम करें विस्मिल्लाह! यह तो सचमुच में नयी पीढ़ी के साथ घोर अत्याचार है, इमोशनल ड्रामा है कि आप ये करें वह न करें। सच पूछिये तो सारा किया धरा उन्हीं तथाकथित विरोधियों का है, जो खुद तो शूट पैंट टाई का मोह छोड़ नहीं पाते और यंग जेनेरेशन को धोती-कुर्ता पहनाने की सलाह देते हैं। खुद तो विदेशी कारों में चलने को उतावले होते हैं, पर यंग जेनेरेशन को टमटम पर चलने का ज्ञान बांटते नहीं अघाते। इनकी पूरी कोशिश
होती है कि अंदरखाने आइसक्रीम व कोल्ड ड्रिंक का मजा ये लें और यंग जेनेरेशन को गुड़ का शरबत पीने के लिए बाध्य कर दें। इस साल भी ये महान आत्माएं सड़कों पर लट्ïठम्ï-लट्ïठ रहेंगी और हैप्पी न्यू ईयर मनाने वालों को गुडी-गुडी फील नहीं होने देंगी। खैर, यह सब तो चलता ही रहता है। कभी हल्के में कभी भारी में, मगर आप अपनी तैयारी पूरी कर लिजिए और नये साल का दिल खोलकर स्वागत किजिए। नववर्ष के मंगलमय होने का मामला फंसना नहीं चाहिए और आगामी जिंदगी रसमय बनी रही इसी कामना के साथ हैप्पी न्यूईयर ट्ïवेंटी-टेन! ओय-होय ये मैं क्या बोल रहा हूं, खालिस जेनेरेशन नेक्स्ट की भाषा। भईये ये नहीं बोलूंगा तो सुनेगा कौन यार? वैसे भी सुनने के लिए कान के छिद्र खुले होने चाहिए, यहां तो कानों में कनठुसवा...सॉरी सॉरी इंपोर्टेड हेडसेट ठूंसा रहता है। तो आप कुछ भी बोलिए, गाईये, चिल्लाईये कोई ध्यान देने वाला नहीं है और न हीं ध्यान से सुनने वाला, तो बेफिक्र होकर अपने हिसाब की बातें बोलिए, अपने ढंग से हैप्पी न्यूईयर विश करिये। जनाब! सुनने को तो आजकल लोग नेताओं का भाषण नहीं सुनते हैं, टीचर का व्याख्यान नहीं सुनते हैं, पुलिस की सीख नहीं सुनते हैं, तो आप भला किस खेत की मूली हैं, जो लोग आपको सुनेंगे। मस्त रहिये और जो मन में आये बकते रहें, कोई अपोजिसन नहीं, कोई आपत्ति नहीं, कोई कमेंट नहीं, कोई परमानेंट नहीं, सबकुछ नश्वर है। इसलिए एक बार फिर से नववर्ष मंगलमय हो, जिंदगी रसमय हो, आमजनता की जय हो, नेताओं में भय हो, आतंकवादियों का क्षय हो, मंहगाई का नाश हो, लुगाई का कल्याण हो, अपनी विजय हो, परायों की भी जय हो।
जय भड़ास जय जय भड़ास

25 दिसंबर 2009

क्रिसमस क्रिसमस हैप्पी क्रिसमस

जिंगल वेल जिंगल वेल...से ही मेल खाता गाना थ्री इडियट्ïस फिल्म में भी है जो आज की कर्णप्रिय मानी जाने वाली धुन में सुबह से ही कानों में रस घोल रहा है। ऑल इज वेल॥ जिंगल वेल के मौके को कैश करने का अपना इंडियन स्टाइल है। आप इसे इडियटपना कहें तो अपनी समझ से, मगर है यह शुद्ध मार्केटिंग। 100 करोड़ से भी ज्यादा आबादी वाले देश में 5 करोड़ से भी कम ईसाई धर्म के अनुयायी रहते हैं। मगर, अनेकता में एकता और सर्वधर्म समभाव की हमारी संस्कृति का ही कमाल है कि आज करोड़ों लोग एक दूसरे को हैप्पी क्रिसमस की मुबारकबाद दे रहे हैं। सुबह से तांता लगा है, ऐसे मित्र जो साल में बस त्यौहारों के दिन एक मोबाइल मैसेज़ के रुप में प्रकट होते हैं और कहीं और से रीसीव मैसेज को फारवर्ड करके अपने प्यार का इज़हार करते हैं। सच ही तो है कि क्रिसमस प्यार बांटने का त्यौहार है।
मगर, कुछ ऐसे भी करमजले दुनिया की इसी धरती पर विराजमान हैं, जिनके लिए न तो दिवाली की मिठाई में मिठास समझ में आती है और न ही ईद की सेवसियों की खूश्बू। होली के रंग, बदरंग हो चुके शरीर पर कोई असर नहीं कर पाते तो क्रिसमस की क्रीम इन्हें नहीं सुहाती। ये कुछ ऐसे प्राणी हैं जिनके अपने अनडेटेड त्यौहार होते हैं, जो पेट भर खाना खा लेने और थोड़ी देर के लिए अंतरात्मा खुश होने के बाद अचानक ही मन जाया करते हैं।
खैर, जो हैं सो हैं अपनी बला से। हम तो ठस के क्रिसमस मनाने का मूड बना चुके हैं। वैसे भी आज की मंहगार्ई में ठसक ढीली हो गयी है और माथे की सलवटों में इज़ाफा हो चुका है। फिर भी क्रिसमस है, चारों तरफ टीवी में ,अखबार में , इंटरनेट पर रंग-बिरंगी लाइटें सज रही हैं। मुबारकबाद की झडिय़ां लगी हैं और महफिलों का दौर चल रहा है। तो इंसान हैं यार! मन बहक जाता है, इच्छा पैदा हो जाती है, महसूस होता है थोड़ा हम भी मना ही लेते हैं। जो होगा देखा जाएगा, कल के बारे में सोचकर आज ही क्यों मरें? सब प्रभु की माया है सबकुछ ओके चलेगा। टेंशन नहीं लेने का, बिंदास क्रिसमस मनाने का हैप्पी क्रिसमस!
यकायक एकलौते सिंगल सीम वाला मोबाइल बज उठा, देखा तो मैसेज आया था, मोबाइल कंपनी का ही मैसेज था। बिना पूछे-मते क्रिसमस का रिंगटोन सेट करके पैसे डिडक्ट करने के बाद यह मैसेज हमारे सुपूर्द किया था। चलिए कोई बात नहीं हूजूर कुछ लोग ऐसे भी क्रिसमस मनाते हैं। जबरिया गाना सुनाकर। वैसे कमाने से याद आया...मंहगाई है फिर भी कमाने वाले धड़ल्ले से कमा रहे हैं। गंवाने वाले उसी रफ्तार से गंवा रहे हैं। भौचक होकर देखने वाले वैसे ही आंखे फाड़े देख रहे हैं। सबकुछ रुटीन वर्क की तरह चल रहा है। क्या करें त्यौहार तो साल में एक-एक दिन ही आते हैं। बाकी सबकुछ तो डेली चलता रहता है।
सॉरी सॉरी सॉरी...क्रिसमस के हैप्पी मोमेंन्ट्ïस पर मैं भी कैसी पकाऊ बातें कर रहा हूं। वैसे भी आलम यह बन रहा है कि हिन्दी में क्षमा-याचना मागूंगा तो बहुत कम लोग ही समझेंगे कि आखिर मैं मांग क्या रहा हूं? यह मेरा नहीं भाषा का प्रभाव है। क्रिसमस बस त्यौहार भर नहीं है यह भाषा के बाज़ार को पुष्टï करती है और बाज़ार हमारा भाव तय करता है। भावनाओं का खयाल रखता है। इसलिए आज क्रिसमस है, बाजार भाव डाउन चल रहें है, बंपर सेल लगी है सककुछ सस्ता-सस्ता दिख रहा है, इसलिए इस भरी मंहगार्ई में खूब बिक रहा है। जिसकी जितनी बढिय़ा बिक्री उसका उतना हैप्पी क्रिसमस। मगर, हम तो भई बिकने, बिकाने से दूर मस्तिया के क्रिसमस मनाएंगे। आखिर हम भी तो इंसान हैं यार अपनी भी कुछ ख्वाहिशें हैं, तमन्ना है और इन सबसे बढ़कर एक दिल है जो हमेशा हैप्पी रहना चाहता है। अंत में आप सबके दिल को दिल से हैप्पी क्रिसमस....

17 दिसंबर 2009

दिल्ली की सर्दी ठंडा ठंडा कूल कूल

सर्दियों में सर्दी, उस पर भी दिल्ली की सर्दी! यह तो वही बात हो गयी कि एक तो करेला दूजे नीम पर चढ़ गया। फिल्मों के गीतों में, कहानियों में न जाने कितनी बार दिल्ली की सर्दी का जिक्र आया है। मगर, सच्चाई इधर कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। सच तो यही है कि दिल्लीवासियों के लिए सर्दी किसी वरदान से कम नहीं है और इससे लोग घबराते नहीं बल्कि दिल खोलकर दिल्ली की सर्दी का इस्तकबाल करते हैं। किसी मासूम शायद ने शायद ठीक ही कहा है कि सर्दी के इस मौसम में हर रंग चेहरे पर उतर जायेगा। न जाने कौन सी गिलाफ में किसका चेहरा अपना अक्स छुपायेगा॥ हम बात कर रहे हैं दिल्ली की सर्दी की, अबकी एक बड़े निर्देशक की बड़ी फिल्म की शूटिंग दिल्ली में हो रही है। बड़ा सा सेट सजाया गया और बड़ा सा स्टारकास्ट दिल्ली के एक बड़े से पंचतारा होटल में रुका। फिल्म में काम करने वाली बड़ी सी हीरोइन का पहले ही दिन सेट पर ठंडी हवा के झोंको से आमना-सामना हो गया। फिर क्या था, उन्होंने पहले से ही दिल्ली की सर्दी के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। इसलिए जैसे ही ठंडी हवाओं ने उनसे जुम्बिश की बेचारी सकते में आ गयीं। उन्होंने तुरंत अपने प्रोड्ïयूसर से बोल दिया कि मुझे ठंड लग गयी है और आज की शूटिंग कैंसिल? प्रोड्ïयूसर बेचारा, मरता क्या न करता की तजऱ् पर पैकअप बोलकर होटल के लिए रवाना हो गया। इधर दिल्ली की जनता, जो कई घंटो से सूरज की लुका-छिपी के बीच शूटिंग देखने के लिए लालायित खड़ी थी, उनको निराशा हाथ लगी। फिल्म की हीरोइन सीधे मेकअप रुम में घुसकर अपने चेहरे पर चढ़ी कई कई पर्त का मेकअप उतारने लगीं। तभी मेकअप मैन ने कहा-मैडम जल्दबाजी मत किजिए, ठंडे पानी से ही चेहरा साफ करिये, वर्ना आपका दमकता हुआ चेहरा मुरझा जायेगा। मैडम ने कहा-ठीक है ठंडा पानी मंगाईये। तभी स्पॉट बॉय दौड़ा-दौड़ा बगल की दुकान से चील्ड बिसलेरी का बॉटल ले आया। एक तो ठंडी का मौसम, उसपर से चील्ड वाटर, जैसे ही मैडम ने पानी हाथ में लिया, उनको कंपकपी का दौरा पड़ गया। अगल-बगल खड़े सारे लोग भी हिलने-डूलने लगे, कोई तौलिया लेकर मैडम का ढंक रहा था, तो कोई सेट का परदा ही फाड़ लाया, मगर सर्दी थी कि मैडम को छोडऩे के लिए तैयार ही न हो। बाहर खड़ी भीड़ यह सब नज़ारा देख रही थी और सब मजे ले लेकर इसी बारे में चर्चा कर रहे थे। वहीं पास में खड़ा एक बच्चा हाथ में ठंडा कोक लिए गटागट पी रहा था। किसी ने उससे कहा कि जाओ- मैडम को समझाओ कि उतनी सर्दी नहीं है, जितना आप समझ रही हैं। बच्चा था भी दिल्ली का नटखट छोटा, ठंडे कोक की बोतल हाथ में लिए वह सीधा मेकअप रुम की तरफ बढ़ चला। जैसे ही मैडम की नज़र उस बच्चे पर पड़ी उनकी सर्दी जाती रही, क्योंकि सर्दी तो उनके मन में घर कर चुकी थी, लेकिन जैसे ही उन्होंने देखा कि एक छोटा सा बच्चा इतनी ठंड में भी हाथ में ठंडी बोतल लिए कोक पी रहा है, तो भला मैं क्यूं डरुं ठंड से? नायिका का घमंड जाग गया और अहंकार बोलने लगा, उन्होंने तुरंत सारा कपड़ा, तौलिया सब परे हटा दिया और अकड़कर बोलीं- टेंशन की कोई बात नहीं मैं शूटिंग करने के लिए तैयार हूं। बच्चे का काम हो गया था, वह चुपचाप आकर भीड़ में एक तरफ खड़ा हो गया और लोगों से बोला, दिल थामकर जमे रहो, पिक्चर अभी बाकी है। उधर पूरा का पूरा फिल्मी स्टॉफ हरकत में आ गया, लाइटें तैयार की जाने लगीं और सेट को पुन: सजाया जाने लगा। तभी किसी ने मैडम से कहा कि- मैडम डायरेक्टर साहब और प्रोड्ïयूसर अंकल तो वापस होटल जा चुके हैं। फिल्म कैसे शूट की जाएगी, मगर मैडम हीरोइन तो दंभ में चूर थीं, उन्होंने आंखे तरेरकर कहा- उन्हें तुरंत फोन करके बुलाया जाये, वर्ना मैं शूटिंग बीच में ही अटकाकर वापिस मुंबई चली जाउंगी। स्पॉट ब्वाय ने फौरन मोबाइल से डायरेक्टर व प्रोड्ïयूसर को इंफार्म कर दिया। इतना सब होते-हवाते शाम के चार बज गये थे। धीरे-धीरे मौसम और सर्द होता जा रहा था, क्योंकि दिल्ली की सर्दी तो वास्तव में शाम और अलसुबह ही ज्यादा समझ में आती है, क्योंकि रात को सारे दिल्लीवासी अपने-अपने घरों में कैद होकर विभिन्न प्रकार के इलेक्टॉनिक उपकरणों के कमरे गर्म कर लेते हैं और गर्र्म रज़ाई में दुबककर रात्रि विश्राम करते हैं। खैर जैसे-जैसे सर्दी का टंप्रेचर बढ़ता जा रहा था, ठीक वैसे-वैसे मैडम नायिका का ट्रंप्रेचर भी हाई होता जा रहा था। वे काफी देर से कम कपड़ों में बैठी, डायरेक्टर व प्रोड्ïयूसर का इंतज़ार कर रही थीं। मगर, इन दोनों का कहीं अता-पता नहीं था। इधर शूटिंग देखने वाले दिल्लीवासियों का दिमागी पारा भी चढ़ रहा था। क्योंकि जिस हिरोइन का ज़लवा देखने के लिए वे यहां सुबह से ही इकट्ïठे हुए थे, उसका असली दीदार नहीं हो पाया था। जनता भी हो-हल्ला मचाने लगी और फिल्म की पूरी यूनिट हिरोइन के इर्द-गिर्द जाकर जमा हो गया। तभी नायिका का मोबाइल घनघना उठा। जैसे ही नायिका ने मोबाइल के माउथपीस से अपने होंठ सटाये, उधर से डायरेक्टर साबह गुर्राये और बोले- आप आखिर चाहती क्या हैं? पहले तो भरी दोपहरी में आपको ठंड लग गयी और शूटिंग रुकवा दी, फिर अचानक जब वास्तव में ठंड पडऩी शुरु हुई तो आपको शूटिंग की सूझ रही है? मैडम नायिका ने कहा- देखिए आप ठंड की चिंता मत किजिए, बस किसी तरह से शूटिंग चालू कराईये, मुझ आज ही शूटिंग करनी है। डायरेक्टर साहब बोले- आज तो शूटिंग बिल्कुल भी नहीं हो सकती क्यूंकि मुझे ज़ुकाम हो गया है और प्रोड्ïयूसर साहब वहां से आने के बाद टल्ली हो चले हैं, अच्छा यही है कि आप भी होटल वापस चली जार्ईये, शूटिंग कल कर ली जाएगी। इतना कहकर उन्होंने फोन डिसकनेक्ट कर दिया। मैडम हिरोइन को कुछ सूझ नहीं रहा था, क्योंकि अनज़ाने में ही सही मगर उन्होंने बच्चे से बैर जो मोल ले लिया था। वे अभी कुछ सोच ही रही थीं कि फोन की घंटी फिर बज उठी, इस बार एक बड़े हीरो का फोन था, उन्होंने कहा- आप जहां भी हैं, जैसी भी हैं, वहीं रहिये, मैं 5 मिनट में वहां पहुंच रहा हूं और हमारा पहले से जो कंसाइनमेंट था, ठंडे पेय पदार्थ के विज्ञापन की शूटिंग का उसे लगे हाथ निबटा ही लेते हैं, क्यूंकि मैं भी कल अमेरिका जाने वाला हूं, फिर डेट्ïस की प्रॉब्लम हो जायेगी। मैडम नायिका ने कहा- ऑल राइट! वहां कुछ ही मिनटों में दनदनाती हुई कई कारें आ धमकीं। विज्ञापन का डायरेक्टर, हीरो, कैमरामैन, मेकअप मैन सहित 1 पेटी ठंड पेय की बोलतें साथ थी। मैडम नायिका की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, वे बाहर आयीं और भीड़ की तरफ मुखातिब होते हुए बोलीं- आप लोग निराश मत होओ, अभी शूटिंग शुरु हो जाएगी। जनता ने भी चैन की सांस ली, सारी तैयारियां पूरी कर ली गयीं, लाइट कैमरा एक्शन बोलते ही हीरो ठंडे पेय का बोतल हाथों में चिल्लाया- है कोई माई का लाल जो इस काले पानी को पीकर दिखाये। तभी हीरोइन बोली- तुमने डॉयलाग से कर दिया है बोर, लेकिन मेरा दिल मांगे मोर और यहीं कहते ही हीरोइन ने हीरो के हाथ से बोतल छीन ली और अपने अधरों से लगा लिया। उनका प्रण पूरा होने को था, बच्चे के आगे झुकना उन्हें गंवारा नहीं था, इसलिए वे भरी महफिल में सर्दी के मौसम में ठंडे पेय को पीना चाहती थी। जैसे ही उन्होंने घूंट मारनी चाही, वही बच्चा भीड़ से बाहर निकलकर बोला- मैडम दिल्ली की सर्दी मत जाईये भूल, क्योंकि यह है ठंडा ठंडा, कूल-कूल। बच्चे की शरारत पर सभी ठहाके मारकर हंसने लगे, साथ में हीरो और हीरोइन भी।