06 दिसंबर 2008

अजमल कसाव बनाम कैप्टन सिंह

सबसे पहले मैं आपको शीर्षक में दिए गए नाम और उनके काम का परिचय दे रहा हूँ। पहला नाम है अजमल कसाव, शायद यह नाम अपने सुन रखा है। अगर नही सुना तो कोई सा एक न्यूज़ चैनल चला लीजिये आपको पता चल जाएगा की यह किस दरिन्दे का नाम है। अजमल कसाव वोही है जिसे मुंबई हमले के दौरान जिन्दा पकड़ लिया गया था। ये वोही पाकिस्तानी आतंकवादी है जिंसने वीटी स्टेशन पर अंधाधुंध फायरिंग करके ५३ लोगों को मौत की नींद सुला दिया था। ये वोही है जिसने करकरे , साल्वे और आमटे को गाड़ी में ही भुन दिया था। ये वोही आतंकवादी है जिसे गिरगांव चौपाटी पर हुई गोलीबारी में जिन्दा पकड़ा गया है। दूसरा नाम है , कैप्टन सिंह ! ये वोही कैप्टेन सिंह हैं जिन्होंने आतंकी हमले में अपनी जान की बाज़ी लगा दी। ये वोही कैप्टेन सिंह है जिसने कमांडो करवाई के दौरान रूम नम्बर १८ में आतंकियों के होने की भनक मिलने के बाद रूम के दरवाजे को उडा दिया और जैसे ही वे आतंकियों को मारने के लिए रूम में घुसे , पहले से घाट लगाये आतंकवादियों ने इनपर हथगोला फेंक दिया। बुरी तरह जख्मी कैप्टन सिंह बेहोश हो गए। ये वोही कैप्टन सिंह है जिसके जज्बे ने आतंकियों को मार गिराने में महती भूमिका निभाई थी। पुरे शरीर में बम के छर्रे घुस गए थे , लेकिन एक छर्रा इनकी आंख से भी पर निकल गया। आज दोनों , अजमल कसाव और कॅप्टन सिंह डॉक्टरों की देखरेख में हैं। एक अजमल कसाव है जिसे बचाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। होनी भी चाहिए क्योकि इससे जाँच में सहयोग मिलने की आशा है। देश के आला अफसरान और मंत्री अजमल कासव का हाल-चाल लेते चल रहे हैं। दूसरा है एक आम सिपाही जिसने देश की रक्षा के लिए सब कुछ लुटा दिया है। यहाँ तक की अपनी ऑंखें भी, अब वो कभी इस दुनिया को नही देख पायेगा। लेकिन उसे देखने भी तो कोई नही आ रहा है? न सेना के अधिकारी और न ही कमांडो दस्ते से कोई अधिकारी। बाकी रही नेताओं और मंत्रियों की बात तो भाई साहेब इनसे किसी प्रकार की आशा रखना निहायत बेवकूफी होगी। हाँ , कुछ देशभक्त लोगों से उम्मीद लगायी जा सकती है , जो इस वीर सिपाही की मदद करने की हिम्मत रखतें हैं। एक ही हमले से जुड़े दो लोगों की पहचान आपके सामने है। आप ख़ुद फैसला कर सकते हैं की किसकी जान हमें ज्यादा प्यारी होनी चाहिए। अजमल कासव की या कैप्टेन सिंह की। सुरक्षा से जुड़े लोगों और गृहमंत्रालय वाले इतने निष्टुर कैसे हो सकते हैं जो एक बार भी कॅप्टन सिंह से मिलने की नही जा सके। अगर हम इतनी जल्दी जल्दी अपने वीर सैनिकों को भुलाने लगे तो शायद ( भगवन न करे) अगले हमले में एक झुल्लू यादव भी देखने को न मिले।
मादरे वतन पर यूँ ही , मिटते रहेंगे हम
चाहे कोई फरियाद करे या न करे........
जय भड़ास जय जय भड़ास

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