जीवन तरंगों में उलझा सा मै
नई सुबह की तलाश करता
रात को भी और दिन को भी।
आज भोर में ही नींद
गायब हो गई आँखों से
कमरे का सन्नाटा मुझे
अब भी सोने के लिए कहता
अंधेरों से बातें करता मै
न जाने कब सो गया
सुबह आई और चली गई
फिर नई सुबह की तलाश में
दिन के उजाले से लड़ता
बढ़ता रहा अनजान राहों पर
धुन्धुलका छाने लगा था
आसमान में, पंछी डेरे में
लौटने लगे थे और मैं
नई सुबह की तलाश में
रास्ता भटक गया हूँ
अँधेरा घिर आया है चाहुओअर
शोर है सिपाया बिल्कुल नही
शायद नई सुबह आने को है
जीवन तरंगों में उलझा सा
आज भी नई सुबह
की तलाश करता हूँ.......
24 दिसंबर 2008
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Ek ati sunder rachanaa se parichay karaaya aapane, dhanyawaad!
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