03 दिसंबर 2008

दर्द जब हद से ......

पार जाने लगे, दर्द हद से
टीस उठने लगे, हर तरफ़ से
पैर बढ़ने लगे , हर कदम से
लोग जुटने लगे , जब शहर से
तो समझो मामला गड़बड़ है ...
न न्योता न नेता
न नुक्कड़ न नाटक
अब तो खुलने लगे
ख़ुद अपने ही फाटक
आंख मिलने लगे, जब नज़र से
तो समझो मामला गड़बड़ है......
सारे राही हैं, मंजिल का सबको पता
धर्म और जाति न कोई बंधा
सुर मिले हैं सुरों से ,
अब कुछ इस तरह
शर्म भी जब शर्माने, लगी है शरम से
तो समझो मामला गड़बड़ है....
पार जाने लगे, दर्द हद से
पैर बढ़ने लगे , हर कदम से
तो समझो मामला गड़बड़ है...........

1 टिप्पणी:

  1. "Drard jab had se" bahut achchhi kavita likhi hai Manogj Bahi aapne....aap ki kavita ki ye lines ho gajab hai...
    पार जाने लगे, दर्द हद से
    टीस उठने लगे, हर तरफ़ से
    पैर बढ़ने लगे , हर कदम से
    लोग जुटने लगे , जब शहर से
    तो समझो मामला गड़बड़ है ...
    Manoj ji aap sahi hai , aap ne son nadi ki mitti ko achchhi tarah se pahchana hai....Blogere ki duniya me aap ka bahut bahut swagt hai....

    Note : Manoj jo aap apne blog se Word varification hata de , comment dene me problem hoti hai.

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