इंसानों की बस्ती में
हम भी थे इन्सान यहाँ
इंसानों की इस नगरी में
अब बसते हैं इन्सान कहाँ
जब बसते ही इन्सान नहीं
तो हम खुद को क्यू इन्सान कहें
क्यूँ प्रेम, जलन और नफ़रत की
पीडा को हम यूँ ही सहें
इसलिए छोड़ दी हमने भी
इंसानों सी हरकत करना
क्या बस जीना ही जीवन है
तो क्या है फिर पल-पल मरना
जब होश नहीं जीवितों को
तो अब मुर्दों को फिर होश कहाँ।
इंसानों की इस बस्ती में
अब बसते हैं इन्सान कहाँ
इंसानों की इस बस्ती में
अब बसते हैं इन्सान कहाँ...........
24 अप्रैल 2009
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waah ....kya baat kahi hai ...bahut khoob likha hai
जवाब देंहटाएंमेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति
bahut maja aaya different post dekhkar ..nice carry on....
जवाब देंहटाएंबहुत बढिया!! इसी तरह से लिखते रहिए !
जवाब देंहटाएंअच्छी रचना --
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