09 सितंबर 2009

रंगीन चश्मा

ज्यादा देर कंप्यूटर पर कम करने से कुछ हो न हो लेकिन ऊपर वाले की सबसे बड़ी नियामत आंखे! थोडी परेशां सी रहती हैं। आँखों की तकलीफ और अपना बटुआ खंगालने के बाद यह फैसला ले पाया की एम्स में दिखाना ही ठीक रहेगा..कम पैसे में कम बन जायेगी। आँखों में सपने पैदा हो गए की नया चश्मा होगा तो कैसा दिखेगा और मैं कैसा दिखूंगा ? इन्ही सब सपनो को बुनते-बुनते रात की काली चादर हटने को थी..घड़ी में ४ बजाने का अलार्म पहले से सेट किया था। क्यूंकि सुन रखा था की एम्स में दूर-दराज के गरीब-गुरबे और रोगों से पीड़ित आम जनता पौ फटने से पहले ही कतार बना कर खड़े हो जाते हैं..मन में डर था की कही देर न हो जाए..खैर उसके बाद जो भागम-भाग मची वह छोडिये किसी तरह कतार में खड़े होने के बाद ३ घंटे के फिल्मी शो हैप्पी एंडिंग की तरह १० रूपये वाली पर्ची हाथ में थी..खड़े-खड़े टांगे आज न जाने क्या क्या बातें कर रही थी। फिर भी मैं खुश था की चलो आँखों को चश्मा भी मिल जाएगा और इसी बहाने थोडी मेहनत हो जायेगी , सो हो गई थी। आँखों के डॉक्टर वाले लाइन में लग गया..और वह मंजिल भी आ गई की मैं डॉक्टर के सामने था। डॉक्टर देखने में ज्ञानी लगता था और बड़ी-बड़ी बातें करने का शौक भी था उसे..घंटों मरीजों से बातें किया करता था। मुझसे थोडी सी पूछ-ताछ और जाँच पड़ताल के बाद उसने दार्शनिकों वाले अंदाज में जवाब दिया..बेटा जिस रंग का चश्मा पहनोगे दुनिया वैसी ही दिखेगी ..इसीलिए आंखे जब ख़राब हो जाती है तो केवल पॉइंट वाला सफ़ेद चश्मा ही पहनाया जाता है। मैंने अपना प्रेस्क्रिप्शन हाथ में लिया और जरुरी चीज़ें पूछकर वापस चल दिया ...मगर उसकी बातें बार बार दिमाग में आ जाती थी। मैं भी सोचने लगा थी की क्या सचमुच आंखें ये समझ जाती हैं की हमें किस रंग का चश्मा पहनना चाहिए और कब पहनना चाहिए..

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